दुन्ढ्ते हैं…!!

किताबो में मेरे फ़साने दुन्ढ्ते हैं
नादान् हैं गुज़्ररे ज़माने दुन्ढ्ते हैं

जब वो थे….!! तलाश-ए-ज़िंदगी भी थी
अब तो मौत् के ठिकाने दुन्ढ्ते हैं..!!

कल खुद ही अपनी म्हफ़िल् से निकाला था..!!
आज हुए से दिवाने दुन्ढ्ते हैं…!!

मुसाफ़िर् बे-खबर हैं तेरी आँखों से
तेरे शहर मे मएखाने दुन्ढ्ते हैं

तुझे क्या पता ए सितम् ढाने वाले
हम तो रोने के बहाने दुन्ढ्ते हैं…!!

उनकी आँखों का यु देखो ना “कमाल”
नये तीर् हैं…!! निशाने दुन्ढ्ते हैं..!!

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